राजस्थान में सामन्त व्यवस्था

राजस्थान में सामन्त व्यवस्था

राजस्थान की सामन्त व्यवस्था रक्त सम्बन्ध और कुलीय भावना पर आधारित थी। सर्वप्रथम कर्नल जेम्स टॉड ने यहाँ की सामन्त व्यवस्था के लिये इंगलैण्ड की फ्यूडल व्यवस्था के समान मानते हुए उल्लेख किया है। इसे विद्वानों ने केवल राजनीतिक शब्दावली के रूप में नहीं लिया वरन् सम्पूर्ण अर्थ में सामन्त व्यवस्था को समझना आवश्यक समझा, इस दृष्टि से अब राजस्थान ही नहीं वरन् भारत के संस्थागत इतिहास के अध्ययन का नया क्षेत्र खुल गया। राजस्थान की सामन्त व्यवस्था पर व्यापक शोध कार्य के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यहाँ की सामन्त व्यवस्था कर्नल टॉड़ द्वारा उल्लेखित पश्चिम के फयूडल व्यवस्था के समान स्वामी (राजा) और सेवक (सामन्त) पर आधारित नहीं थी राजस्थान की सामन्त व्यवस्था रक्त सम्बन्ध एवं कुलीय भावना पर आधारित प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था थी।

राजस्थान में सामन्त व्यवस्था का मूल तत्व था शासक पिता की मृत्यु के बाद बड़ा पुत्र राजा बनता, राजा अपने छोटे भाइयों को जीवन यापन के लिये भूमि आंवटित करता, भाई-बन्धु को प्रदत्त उक्त भूमि का स्वामी सामन्त कहलाता था। मध्यकाल में भू-स्वामी सामन्त को सामन्त जागीरदार कहा जाने लगा, सामन्त जागीर पर सामन्त का जन्मजात अधिकार माना जाता था, अर्थात राजा सामन्त जागीर को खालसा अर्थात केन्द्र की भूमि में पुनः सम्मिलित नहीं कर सकता था। सामन्त व्यवस्था को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि – सामन्त व्यवस्था रक्त सम्बन्ध पर आधारित कुलीय प्रशासनिक और सैनिक व्यवस्था थी, जिसमें राजा समकक्षों में प्रमुख होता था। राज्य को एक परिवार और राजा को उसका प्रमुख मानते हुए, सामन्त परिवार के सदस्य होने के नाते उसकी सुरक्षा और संचालन का उत्तरदायित्व राजा और सामन्त सामूहिक रूप से मानते थे। राजा और सामन्तों के मध्य भाईचारे का सम्बन्ध था।

सामन्त व्यवस्था का प्रारम्भ :

सामन्त व्यवस्था कब प्रारम्भ हुई, इस सम्बन्ध में अबतक कोई निश्चित मत नहीं बन पाया है। प्रौ. रायचौधरी ने इसका उदयकाल छ:ठी शताब्दी माना हैं, प्रौ. डी.डी. कौशाम्बी ने गुप्त काल के बाद सामन्त व्यवस्था का विकास काल माना है, प्रो. आर.एस. शर्मा ने चौथी शताब्दी में सामन्त व्यवस्था का प्रारम्भ होने से सम्बन्धित तर्क देते हुए इसे ग्याहरवीं और बारहवीं शताब्दी में विकसित हुआ स्वीकार किया है, रूसी इतिहासकार कोवालस्वी ने इसे मुस्लिम आक्रमण के बाद विकसित व्यवस्था माना है। अधिकांश इतिहासकारों की मान्यता है कि सामन्त व्यवस्था सम्भवतः गुप्तकाल में प्रारम्भ हुई, लेकिन राजस्थान में इसका विकसित एवं स्पष्ट स्वरूप राजपूतों का शासन स्थापित होने के साथ प्रारम्भ हो गया राजस्थान भू-भाग पर राजपूतों की विभिन्न शाखाओं- चौहान, गुहिल सिसोदिया, राठौड़, कछवाह, भाटी, हाड़ा आदि ने अपना राज्य स्थापित किया, जो उनकी रियासतें कहलाई अपनी रियासतों की सुरक्षा और सामान्य प्रशासन व्यवस्था संचालन हेतु शासक ने अपने परिवारजनों, कुलीय सम्बन्धियों तथा विश्वस्त सेनानायकों और अधीनस्थों को जागीरें देकर अपना सामन्त बना लिया, कालान्तर में यह रक्त सम्बन्ध कुलीय परम्परा बनगई। साथ ही कई रियासतों में यह परम्परा भी प्रचलित हो गई कि सामन्त को राजा खालसा क्षेत्र जो कि राजा के द्वारा प्रशासित एवं नियंत्रित क्षेत्र था, उस सीमान्त क्षेत्र की भूमि आंवटित की जाती थी, जिससे बाहरी आक्रमण के समय खालसा क्षेत्र की सुरक्षा का उत्तदायित्व निभाये। राजा के सहयोगी यह कुलीय भू-स्वामी मध्यकाल में ‘सामन्त जागीर कहलाने लगी। जागीर फारसी शब्द है, प्रो. इरफान हबीब ने जागीर शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया है – “जागीर दो शब्द जय+गीर का सयुक्त रूप है, जिसका शाब्दिक अर्थ है राज्य द्वारा प्रदत्त भूमि का वह भाग जिससे उस भू क्षेत्र से राजस्व वसूल करने का वैधानिक अधिकारी होता था।

सामन्त व्यवस्था का स्वरूप :

कर्नल जेम्स टॉड ने इंग्लैण्ड की फ्यूडवल व्यवस्था के समान ही राजस्थान की सामन्त व्यवस्था को मानते हुए इसे भी इंग्लैण्ड के समान फयूडवल व्यवस्था माना है, लेकिन राजस्थान की सामन्त व्यवस्था का स्वरूप पश्चिमी व्यवस्था से पूर्णतः भिन्न है। पश्चिम में राजा और सामन्त के मध्य स्वामी और सेवक का सम्बन्ध होता हैं इसके विपरीत राजस्थान के भाई-बन्धु का सम्बन्ध होता हैं, यहाँ राजा समकक्षों में प्रमुख होता है राजा राज्य का सर्वोच्च सत्ता का केन्द्र होता था और उसके बाद सामन्तों का समूह होता, जो कि कुलीय व्यवस्था से संगठित होता था, राजा राज्य का प्रधान था तो सामन्त अपनी जागीर में प्रमुख थे, सामन्त राजनीतिक और सामाजिक मामलों में समानता का दावा करते थे। इसप्रकार राजस्थान में प्रचलित राजा और सामन्त शासन व्यवस्था का प्राथमिक स्वरूप पदसोपान व्यवस्था पर आधारित नहीं था बल्कि एक टेन्ट के समान स्तम्भों पर आधारित व्यवस्था थी, जिसमें राजा मध्य में स्थित मुख्य स्तम्भ होता था। टेन्ट के एक भी स्तम्भ के कमजोर होने पर व्यवस्था बिगड़ जाती है उसी प्रकार सामन्त और शासक के सम्बन्ध परस्पर निर्भर थे। सामन्त प्रशासन स्वरूप की विशेषतायें :

राजा से जन्मजात अधिकार के रूप में प्राप्त भूमि के साथ ही सामन्त के विशेषाधिकार एवं उत्तरदायित्व भी निर्धारित हो जाते थे। इस व्यवस्था की निम्न विशेषताये थी :

  1. यह रक्त सम्बन्ध पर आधारित सगोत्रिय कुलीय व्यवस्था थी।
  2. राजा महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर सामन्तो को नियुक्त करता था।
  3. बिना सामन्तों से परामर्श किये राजा कोई भी महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक, सैनिक एवं नीतिगत निर्णय नहीं ले सकता था।
  4. राजा और सामन्त के सम्बन्ध स्वामी और सेवक के नहीं होते थे, इस तथ्य को सम्मान देते हुये यह आचार सहिंता रूपी परम्परा प्रचलित थी कि शासक सामन्त को काकाजी एवं भाई जी सम्बोधित करें, इसी प्रकार सामन्त भी राजा को बापजी सम्बोधित करते थे।
  5. सामन्त का उत्थान और पतन राजा के साथ ही होता था। इस दृष्टि से सामन्त किसी अन्य राज्य से युद्ध एवं सन्धि का निर्णय नहीं कर सकता था।
  6. राज्य की सुरक्षा के लिये सामन्त को एक निश्चित सेना रखनी होती थी यह कार्य कुलीय भावना के आधार पर ही की जाती थी वे अपनी पैतृक सम्पति की रक्षा करना अपना उत्तरदायित्व समझते थे |
  7. राजा के उत्तराधिकारी के निर्णय में सामन्त निर्णायक भूमिका निभाते थे, कई बार शासक द्वारा मनोनीत उत्तराधिकारी के सामन्तों को स्वीकार नहीं किया और उसे बदल दिया। यहाँ जयेष्ठ पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की परम्परा थी लेकिन ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब सामन्तो को जयेष्ठ पुत्र की योग्यता और नेतृत्व क्षमता पर संदेह हो तो वे योग्य पुत्र या भाई को सिंहासन पर बैठा देते थे।
  8. सम्मान और कर्तव्य पर आधारित प्रशासनिक व्यवस्था थी राजा को सामन्तो के विशेषाधिकारों का सम्मान करना होता था और सामन्तों के राज्य और शासक के प्रति निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना होता था।
  9. मध्यकाल में सामन्त व्यवस्था में श्रेणी व्यवस्था भी प्रारम्भ हुई।

मध्यकाल में सामन्त व्यवस्था एवं प्रशासन :

राजस्थान की सामन्त व्यवस्था पर मध्यकाल में कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। 1562 में मुगल सम्राट अकबर का राजपूतों से सम्बन्ध एवं सन्धियों का युग प्रारम्भ होता है, उक्त नये सम्पर्क ने राजस्थान की विभिन्न रियासतों की प्रशासनिक व्यवस्था जो कि सामन्त व्यवस्था के माध्यम से थी वह प्रभावित हुई। इसका मूल कारण था कि मुगलों से सन्धि के बाद युद्ध की स्थिति लगभग समाप्त हो गई अतः अब शासन की सैनिक सहयोग के लिये सामन्तों पर निर्भरता कम हो गई, इसके अतिरिक्त मुगलों से सन्धि के बाद शासक मुगल मनसबदार बन गये अतः उन्हें मुगल संरक्षण प्राप्त था।

सहयोगी की स्थिति में परिवर्तन :

उक्त परिवर्तित स्थिति के कारण सामन्त प्रशासनिक व्यवस्था पर एक प्रमुख प्रभाव यह पड़ा कि सामन्त की स्थिति सहयोगी के स्थान पर सेवक की हो गई। यद्यपि सैद्धान्तिक रूप से शासक समकक्षों में प्रमुख ही था, लेकिन व्यावहारिक रूप में स्थिति बदल गई, अब राजा स्वामी के समान व्यवहार करने लगा। अब तक सामन्त राजा की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी के मामले में निर्णायक भूमिका निभाते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई, मध्यकाल में मेवाड़ राज्य को छोड़कर अन्य रियासते जो मुगल मनसबदार थे, उन रियासतों के उत्तराधिकारी मामलों में मुगल शासक रुचि लेने लगे, विवादित स्थिति होने पर मुगल शासक अपने विवेक से वहाँ राजा बनाते थे ऐसे नये शासक का सामन्त विरोध नहीं कर सकते थे, इस प्रकार जो सामन्त व्यवस्था एक टेंट का स्परूप लिये हुए थी, वहीं अब मध्यकाल में मनसबदारी व्यवस्था से प्रभावित होकर पदसोपान व्यवस्था के निकट पहुँच गई, यद्यपि मूल स्वरूप यथावत् बना रहा।

सेवाओं के साथ कर व्यवस्था:

परम्परागत शासन व्यवस्था के अनुसार सामन्त युद्ध एवं शान्ति के समय राजा को अपनी चाकरी अर्थात् सेवायें देता था, लेकिन उसके साथ कोई ‘कर’ सम्बन्ध नहीं था। मध्यकाल में बड़ा प्रशासनिक परिवर्तन हुआ, नई व्यवस्था के अनुसार सेवाओं के साथ कर व्यवस्था निर्धारित कर दी गई। सामन्त शासक को पट्टा रेख और भरतु रेख देने लगा, पट्टा रेख से तात्पर्य था राजा द्वारा प्रदत्त जागीर के पट्टे में उल्लेखित अनुमानित राजस्व तथा भरत रेख से तात्पर्य था राजा द्वारा सामन्त को प्रदत्त जागीर के पट्टे में उल्लेखित रेख के अनुसार राजस्व भरता (जमा करता था। इन दो प्रमुख करों के अतिरिक्त अन्य कई कर लगाये प्रत्येक राज्य में अलग-अलग कर व्यवस्था थी, जिनमें प्रमुख कर उत्तराधिकार शुल्क था। इस प्रकार मध्यकाल में मुगल मनसब प्रशासन व्यवस्था से प्रभावित होकर सैनिकों का सैनिक बल उनकी आय के अनुसार निर्धारित कर दिया गया, इसका परिणाम यह हुआ कि शासक सामन्तों पर अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने की प्रक्रिया में आगे बढ़ गये।

रेख:

रेख से तात्पर्य जागीर की अनुमानित वार्षिक राजस्व से था, जिसका उल्लेख शासक प्रदत्त जागीर के पट्टे में करता था रेख का दूसरा अर्थ सैनिक कर से भी लिया जाता है। रेख द्वारा निर्धारित आय के मापदण्डों के आधार पर ही राज्य शुल्क का हिसाब किताब रखता था, रेख के आधार पर ही सामन्त से उत्तराधिकार शुल्क, सैनिक सेवा, न्योता शुल्क आदि का निर्धारण होता था। रेख न तो नियमित रूप से प्रतिवर्ष वसूल की जाती थी और न ही इसकी दर निश्चित थी।

उत्तराधिकारी शुल्क :

सामन्त व जागीरदार की मृत्यु के बाद उक्त जागीर के नये उत्तराधिकारी से यह कर वसूल किया जाता था। अलग अलग रियासतों में उत्तराधिकारी कर का नाम अलग था, जोधपुर में पहले पेशकशी और बाद में हुक्मनामा कहलाया, मेवाड़ और जयपुर में नजराना, कुछ अन्य रियासतों में कैद खालसा और तलवार बंधाई कहलाते थे। जैसलमेर एकमात्र ऐसी रियासत थी जहाँ उत्तराधिकारी शुल्क नहीं लिया जाता था। उत्तराधिकारी शुल्क एक प्रकार से उक्त जागीर के पट्टे का नवीनीकरण करना था जागीरदार की मृत्यु की सूचना पाते ही राजा अपने दीवानी अधिकारी को कुछ कर्मचारियों के साथ उस जागीर में भेजता यदि उत्तराधिकारी शुल्क इन्हे जमा नहीं कराया जाता तो जागीर जब्त करने का निर्देश दीवान को दिया जाता था। कुछ अन्य कर भी थे जैसे नजराना कर यह राजा के बड़े पुत्र के प्रथम विवाह पर सामन्त एवं अन्य जागीरदार नजराना देते, न्योत कर यह राजकुमारियों के विवाह पर आमंत्रित करने पर था, तीर्थयात्रा कर यह राजा के तीर्थयात्रा पर जाने के समय भेंट आदि दी जाती थी। इसप्रकार की कर व्यवस्था से एक और शासक और सामन्त सम्बन्धों पर प्रभाव पड़ा क्योंकि यह व्यवस्था शासक की सर्वोच्चता स्थापित करने में सहायक थी दूसरा करों की संख्या निरन्तर बढ़ने से इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव जनसमुदाय पर पड़ा सामन्त एवं जागीरदार जनता से अधिक लगान वसूली करने लगें।

सामन्तों की सैनिक सेवा :

परम्परागत रूप से सामन्त राजा को सैनिक सेवायें देते थे, यह दो प्रकार की थी- एक युद्ध के समय, दूसरा शान्ति के समय । युद्ध के समय राजा सामन्त को खास रूक्का भेजकर जमीयत (सेना) सहित सेवा में उपस्थित होने के लिये कहता था। शान्ति के समय वर्ष में एक बार निश्चित अवधि के लिये अपनी जमीयत (सेना) के साथ उपस्थित होना, यह उसकी जागीर के पट्टे में निर्धारित ‘रेख’ पर आधारित था। शान्ति के समय शासक की सेवा में उपस्थित होकर वह शासक को राजकार्य में सहयोग देते थे। निश्चित अवधि के अतिरिक्त कुछ विशेष अवसर एवं त्यौहार जैसे- दशहरा, अक्षय तृतीया आदि पर भी दरबार में उपस्थित होना पड़ता था, तथा राज परिवार की महिलाये आदि के तीर्थयात्रा या अन्य यात्रा पर जाने पर किसी भी सामन्त को उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व दिया जाता था। सामन्त को कुछ कार्यों के लिये शासक से पूर्व अनुमति लेनी होती थी विशेषकर अपने पुत्र एवं पुत्री के विवाह की एवं अपनी जागीर में दुर्ग एवं परकोटा बनवाने की।

सामन्तों की श्रेणियाँ :

मध्यकाल में सामन्तों की श्रेणियाँ एवं पद प्रतिष्ठा भी निर्धारित कर दी गई। यह व्यवस्था मुगल मनसबदारी व्यवस्था से प्रभावित थी लेकिन पूर्णतः उसके अनुसार नहीं थी, मनसबदारी व्यवस्था नौकरशाही व्यवस्था थी, जिसका निर्धारण आय के आधार पर होता था, इसके विपरीत राजस्थान में सामन्तों की श्रेणियों का निर्धारण कुलीय प्रतिष्ठा एवं पद के अनुसार होता था। इस व्यवस्था से मेवाड़ रियासत भी अछूती नहीं रहीं, प्रत्येक राज्य की श्रेणी विभाजन की व्यवस्था अलग-अलग थी। मारवाड़ में चार प्रकार की श्रेणियाँ थी – राजवी, सरदार, गनायत ओर मुत्सद्दी। राजवी राजा के तीन पीढियों तक के निकट सम्बन्धी होते थे, उन्हें रेख, हुक्मनामा कर और चाकरी से मुक्त रखा जाता था। मेवाड़ में सामन्तों की तीन श्रेणियाँ होती थी जिन्हे उमराव कहा जाता था, प्रथम श्रेणी के सामन्त सोलह, दूसरी श्रेणी में बत्तीस और तृतीय श्रेणी के सामन्त गोल के उमराव कई सौ की संख्या में होते थे। प्रथम श्रेणी के 16 उमरावो में सलूम्बर के सामन्त का विशेष स्थान होता था, महाराजा की अनुपस्थिति में नगर का शासन-प्रशासन और सुरक्षा का उत्तरदायित्व उसी पर होता था। जयपुर राज्य में महाराजा पृथ्वीसिंह के समय सामन्तों श्रेणियाँ का विभाजन किया, यह उनके 12 पुत्रो के नाम से स्थाई जागीरे चली, जिन्हे कोटडी कहा जाता था। कोटा में राजवी कहलाते थे, राजवी सरदारों की संख्या तीस थी। इनमें सबसे अधिक संख्या हाड़ा चौहानों की होती थी। बीकानेर में सामन्तों की तीन श्रेणियाँ थी प्रथम श्रेणी में वंशानुगत सामन्त जो राव बीका के परिवार से थे, दूसरी श्रेणी अन्य रक्त सम्बन्धी वंशानुगत एवं तृतीय श्रेणी में अन्य राजपूत थे, जिनमें बीकानेर में राठोड़ शासन स्थापित होने से पूर्व शासक परिवार के सदस्य थे एवं भाटी और सांखला वंश के थे। जैसलमेर में भाटी रावल हरराज के शासनकाल में सामन्तों में श्रेणी व्यवस्था प्रारम्भ हुई, दो श्रणियाँ थी एक डावी (बाई) दूसरी जीवणी (दाई)।

सामन्तों की अन्य श्रेणियाँ :

इनमें दो मुख्य थे – एक भौमिया सामन्त और दूसरा ग्रासिया सामन्त, भौमिया वे लोग कहलाते थे, जिन्होने सीमा या गाँव की रक्षा के लिये बलिदान दिया हो इन्हें उनकी जागीर से बेदखल नहीं किया जा सकता था। भौमिया सामन्त दो श्रेणियों में विभक्त थे एक मोटे दर्जे के भौमिया इनके ऊपर कोई दायित्व नहीं था। दूसरा छोटे भौमिया – इन्हें किसी भी प्रकार का लगान राज्य को नहीं देना पड़ता था, लेकिन इन्हे राज्य प्रशासन को कुछ सेवायें देनी पड़ती थी उनमें मुख्य सेवायें थी- डाक पहुँचाना, आवश्यक सहायता पहुँचाना, खजाने की सुरक्षा करना और अधिकारियों के सरकारी यात्रा के समय उनके ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था करना आदि ग्रासिया अपनी सैनिक सेवा के बदले भूमि के ग्रास अर्थात् उपज का उपयोग करते थे, यदि ग्रासियाँ अपनी सेवा में किसी भी प्रकार की ढील दिखाते तो उन्हें ग्रास सामन्त से बेदखल किया जा सकता था।

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