भाद्रपद मास

भाद्रपद मास

भाद्रपद का अर्थ है- भद्र परिणाम देने वाले व्रतों का महीना। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद वर्ष का छठा महीना और चतुर्मास का दूसरा महीना है।अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह अगस्त-सितम्बर महीने में आता है। यह महीना लोगों को व्रत, उपवास, नियम और निष्ठा का पालन करवाता है। इस माह में हरितालिका तीज, कृष्‍ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी का त्योहार मनाते हैं साथ ही लोक देवता गोगाजी, तेजाजी, रामदेवजी की जयंती भी इसी मास में आती है। इसके बाद 15 दिन का पितृपक्ष प्रारंभ हो जाता है।

सभी हिन्दू महीनों की तरह भाद्रपद मास में भी दो पक्ष, कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष सम्मिलित है।

कृष्ण पक्षशुक्ल पक्ष
तृतीया – बड़ी तीज
बूढी तीज
कजली तीज
सातूड़ी तीज
कजली तीज बूंदी जिले की प्रसिद्ध है यहाँ प्रतिवर्ष कजली तीज के उपलक्ष्य में मेला लगता है|
द्वितीया/ दूज – रामदेव जयंती
बाबे री बीज
भाद्रपद शुक्ला द्वितीय से भाद्रपद शुक्ला एकादशी तक जैसलमेर जिले के रामदेवरा में रामदेवजी का मेला लगता है।जिसे मारवाड़ का कुम्भ कहते है।
षष्ठी/छठ – हल छठ
बलराम छठ
ऊभ छठ
चन्दन षष्टी, चन्ना छठ
राजस्थान में मुख्यतः कुंवारी कन्यायों द्वारा यह व्रत किया जाता है। पूरा दिन खड़े रहकर व्रत करती है तथा सांय चंद्रोदय के दर्शन करके व्रत खोलती है |
तृतीया – हरतालिका तीज
इसे तीजा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व है।
अष्टमी – कृष्ण जन्माष्टमी
भगवान् श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। मंदिरों में सुन्दर झांकियां बनाई जाती है। लोग उपवास करते है तथा रात को 12 बजे जन्मोत्सव मनाकर उपवास खोलते है।
चतुर्थी – गणेश चतुर्थी
शिव चतुर्थी
कलंक चतुर्थी
चतरा चतुर्थी
सवाई माधोपुर जिले के रणथम्भौर में स्थित त्रिनेत्र गणेश मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को विशाल मेले का आयोजन होता है।
नवमी – गोगानवमी
गोगाजी की स्मृति में गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) में भाद्रपद कृष्ण नवमी को जिसे गोगानवमी’ भी कहते है पर विशाल मेले का आयोजन होता है।
पंचमी – ऋषि पंचमी
इस दिन सप्त ऋषियों का स्मरण कर श्रद्धा के साथ उनका पूजन किया जाता है। हमारे शास्त्रों में कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ ये सात ऋषि बताए गए हैं।
इस दिन माहेश्वरी समाज का रक्षाबंधन मनाया जाता है।
द्वादशी/ बारस – बछबारस
यह त्यौहार पुत्र की लम्बी उम्र के लिए मनाया जाता है। इस दिन महिलायें गाय व बछड़े की पूजा करती है।अंकुरित मूंग चना व मक्की बाजरे की रोटी खाती है तथा चाक़ू का प्रयोग नहीं करती है।
अष्टमी – राधा अष्टमी
इस तिथि को श्री राधाजी का प्राकट्य दिवस माना गया है।
राधाष्टमी को निम्बार्क सम्प्रदाय (इस सम्प्रदाय में राधाजी को कृष्ण की परिणीता माना जाता है।) का अजमेर के सलेमाबाद में मेला लगता है।
दशमी – तेजा दशमी
तेजा दशमी के अवसर पर पंचमी से पूर्णिमा तक परबतसर (नागौर) में विशाल पशु-मेला लगता है।
एकादशी – जलझूलनी एकादशी
देव झुलनी एकादशी
डोल ग्यारस
परिवर्तिनी एकादशी
श्रीकृष्ण जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जल पूजन (घाट पूजन) किया था। इसी दिन को ‘डोल ग्यारस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवन श्री कृष्ण की मूर्तियों को स्नान करवाया जाता है।
चतुर्दशी – अनंत चतुर्दशी
अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाले गणेश उत्सव का समापन होता है। तथा मंगल कामना के साथ गणेश जी की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।
पूर्णिमा – श्राद्ध/पितृ पक्ष प्रारम्भ
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है।

राजस्थान में भाद्रपद मास में आयोजित होने वाले मेले :

कजली तीज मेला, बूंदी

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया को आयोजित होने वाली कजली तीज, सातुडी तीज, बड़ी तीज और भादवा की तीज भी कही जाती है। यह महिलाओं के सौलह श्रृंगार और पति-पत्नि के प्रेम का प्रतीक है। हाडौती में कजली तीज विख्यात है। बूंदी जिले में नगर परिषद द्वारा दो दिवसीय तीज सवारी निकाली जाती है तथा मेला लगता है। जिसमे विभिन्न कलाकारों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुति की जाती है।

गोगाजी का मेला, (गोगामेड़ी, हनुमानगढ़)

गोगाजी का मुख्य स्थान धुरमेड़ी हनुमानगढ़ जिले में नोहर के पास स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण नवमी जिसे गोगानवमी भी कहते है को मेला लगता है। गोगामेड़ी में गोगाजी का समाधी स्थल है। गोगाजी हिन्दू तथा मुसलमान दोनों धर्मो में समान रूप से लोकप्रिय है। राजस्थान के अतिरिक्त गुजरात, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश से भी दर्शनार्थी इस मेले में पहुँचते है।

रानी सती का मेला, झुंझुनू

झुंझुनू में वर्ष में दो बार माघ कृष्ण नवमी व भाद्रपद कृष्ण नवमी को रानी सती का मेला लगता है। पहली बार यह मेला 1912 में आयोजित किया गया था। अपने पति के साथ सती होने वाली नारायणी देवी की स्मृति में यह मेला आयोजित होता है। मार्च 1988 में भारत सरकार द्वारा सती (निवारण) अधिनियम पारित करने के पश्चात् इस मेले पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

रामदेवजी का मेला, (रामदेवरा, जैसलमेर)

भाद्रपद शुक्ला द्वितीय से एकादशी तक राजस्थान के लोकदेवता रामदेवजी का जैसलमेर के रामदेवरा में मेला लगता है। इस मेले में दूर-दूर से भक्त पैदल यात्रा करते हुए पहुँचते है। भाद्रपद मास में सफेद रंग की या पचरंगी ध्वजा को हाथ में लेकर सैंकड़ों जत्थे रामदेवरा की ओर जाते नजर आते हैं। इन जत्थों में सभी आयु वर्ग के नौजवान, बुजुर्ग, स्त्री−पुरूष और बच्चे पूरे उत्साह से बिना थके अनवरत चलते रहते हैं। बाबा रामदेव के जयकारे लगाते हुए यह जत्थे मीलों लम्बी यात्रा कर बाबा के दरबार में हाजरी लगाते हैं। साथ लाई गई ध्वजाओं को मुख्य मंदिर में चढ़ा देते हैं। एकादशी तक लगने वाले इस अंतरप्रांतीय मेले में राजस्थान सहित गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कोलकाता, मद्रास, बैंगलोर, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा व दिल्ली आदि प्रांतों से भी यात्री सम्मिलित होते है।
रामदेवरा आने वालों के लिए बड़ी संख्या में धर्मशालाएं और विश्राम स्थल बनाये जाते हैं। सरकार की ओर से मेले में व्यापक प्रबंध किये जाते है। रात्रि को जागरणों के दौरान रामदेवजी के भोपे रामदेवजी की थांवला एवं फड़ बांचते हैं।मेले का मुख्य आकर्षण-कामड़िया पंथ के लोगों द्वारा किया जाने वाला तेरह ताली नृत्य है।

डिग्गी कल्याण जी का मेला

जयपुर से लगभग पिचहत्तर किलोमीटर दूर टोंक जिले की मालपुरा तहसील में भगवान विष्णु के स्वरूप कल्याण जी का मंदिर स्थित है। यहाँ वर्ष में 3 बार श्रावण माह की अमावस्या को, वैशाख पूर्णिमा को तथा भाद्रपद मास की एकादशी को मेला लगता है। कल्याण जी के बहुत सारे भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना के साथ जयपुर से डिग्गी तक की पैदल यात्रा भी करते हैं। डिग्गी कल्याण जी की बहुत अधिक मान्यता है और यह मान्यता प्रदेश की सीमाओं से बाहर बिहार, बंगाल और आसाम तक व्याप्त है।

गणेश चतुर्थी, (रणथम्भौर, सवाईमाधोपुर)

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के रणथम्भौर में स्थित त्रिनेत्र गणेश मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी जिसे गणेश चतुर्थी भी कहते है को विशाल मेले का आयोजन होता है। यह मंदिर विश्व धरोहर में शामिल रणथंभोर दुर्ग के भीतर बना हुआ है। भारत के कोने-कोने से लाखों की तादाद में दर्शनार्थी यहाँ गणेश जी के दर्शन हेतु आते हैं और कई मनौतियां माँगते हैं। इस मंदिर में भगवान गणेश त्रिनेत्र रूप में विराजमान है जिसमें तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। पूरी दुनिया में यह एक ही मंदिर है जहाँ भगवान गणेश जी अपने पूर्ण परिवार, दो पत्नी- रिद्दि और सिद्दि एवं दो पुत्र- शुभ और लाभ, के साथ विराजमान है।लोक प्रथा के अनुसार विवाह की कुमकुम पत्रिका रणथम्भौर के गणेशजी को सर्वप्रथम पहुंचाई जाती है।

हरिराम बाबा का मेला, (झोरड़ा, नागौर)

लोक देवता श्रीहरिराम बाबा का मेला भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागौर के झोरड़ा धाम में लगता है।

भोजन थाली मेला

भरतपुर के कामां में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पंचमी को भोजन थाली मेला आयोजित किया जाता है। यह भोजन मेला प्राचीन बृज संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

भर्तृहरि का मेला

अलवर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर बाबा भर्तृहरि की समाधि है, जहाँ वर्ष में दो बार बैसाख मास में और भाद्रपद शुक्ल सप्तमी-अष्टमी को मेला लगता है। कहा जाता है कि उज्जैन के राजा गोपीचन्द भर्तृहरि बहुत बड़े राजपाट के स्वामी थे। तथा उनकी पत्नी रानी पिंगला अतीव सुन्दरी थी। किसी कारण राजा के मन में विरक्ति आ गई और उन्होंने अपना राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। जगह-जगह विचरण करने वाले भर्तहरि बाबा को यह जंगल बहुत अच्छा लगा और वे मृत्यु पर्यन्त यहीं रहे। यहीं उनकी समाधि भी बनाई गई। तीन तरफ सुरम्य पहाड़ियों से घिरे इस स्थान पर एक झरना भी बहता है।अपना नया काम शुरू करने और संकट निवारण के लिए श्रद्धालु बाबा का भण्डारा भी बोलते हैं। मेले में मुख्यतः मीणा, गुज्जर, अहीर, जाट तथा बागड़ा जाती के लोग पहुँचते है। मेले के दौरान यहां कुम्भ मेले जैसा वातावरण बन जाता है।

देवनारायण जी का मेला

आसींद (भीलवाड़ा) तथा देवमाली (अजमेर) में देवनारायण जी के प्रमुख मंदिर है यहाँ भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को मेला लगता है। इनके मुख्य अनुयायी गूर्जर देवजी और बगड़ावतों से संबद्ध काव्य ‘बगड़ावत’ के गायन द्वारा इनका यशोगान करते हैं।इस दिन गुर्जर जाति के लोग दूध नही बेचते है।

राधा अष्टमी मेला

  1. सलेमाबाद, अजमेर
    • भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को जन्माष्टमी मनाई जाती है उसके ठीक 15 दिन बाद भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को राधा अष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। राधाष्टमी को निम्बार्क सम्प्रदाय (इस सम्प्रदाय में राधाजी को कृष्ण की विवाहिता अर्थात परिणीता माना जाता है।) का अजमेर के सलेमाबाद में मेला लगता है।
  2. खेड़मेला, बाड़मेर
    • बाड़मेर के बालोतरा के खेड़ गांव में स्थित प्रसिद्ध रणछोड़राय तीर्थ में राधाष्टमी का मेला भरता है। मेले में हाट बाजार के साथ ही बच्चों के मनोरंजन के लिए झूलें आदि लगाए जाते है।

तेजाजी का मेला/परबतसर का मेला, (परबतसर, नागौर)

भाद्रपद शुक्ल दशमी जिसे तेजादशमी भी कहते है के अवसर पर पंचमी से पूर्णिमा तक परबतसर (नागौर) में विशाल पशु-मेला लगता है।इस मेले में लाखो श्रद्धालु दूर-दूर से पहुँचते है। तेजाजी को काला-बाला का देवता तथा कृषि कार्यों के उपासक देवता के रूप में भी पूजा जाता है।

भाद्रपद मास में लगने वाले अन्य मेले

मेलातिथिस्थान
1सुरसुरा का तेजाजी मेला भाद्रपद शुक्ल दशमीसुरसुरा गाँव, अजमेर
2मुंडवा का तेजाजी मेलाभाद्रपद शुक्ल दशमीमुंडवा गाँव, नागौर
3वीर फत्ताजी का मेला भाद्रपद शुक्ल नवमीसांथू गाँव, जालौर
4चार भुजा का मेलाभाद्रपद शुक्ल एकादशी उदयपुर
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