लौहयुगीन सभ्यता

राजस्थान की लौहयुगीन सभ्यता

लौहयुगीन सभ्यता

ईसवाल

  • सभ्यता – लौहयुगीन सभ्यता
  • सभ्यता जिला – उदयपुर

ईसवाल उदयपुर की एक प्राचीन औद्योगिक बस्ती है। राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के पुरातत्व विभाग द्वारा किए गये उत्खनन से यहाँ से दो हजार वर्ष तक निरंतर लोहा गलाने के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पाँच स्तरों पर बस्तियाँ होने के प्रमाण मिलते हैं, जो प्राक् – ऐतिहासिक काल से मध्य काल तक विकसित थी । मौर्य, शुंग व कुषाण काल में यहाँ लोहा गलाने का कार्य होता था ।

उत्खनन में प्राप्त मुख्य वस्तुएं :

  • यहाँ उत्खनन में हड्डियाँ एवं ऊँट का दाँत मिला है।
  • यहाँ प्राप्त अवशेषों से पता चलता है की यहाँ मकान पत्थरों से बनाये जाते थे ।
  • उत्खनन में लौह मल, लौह अयस्क, मिट्टी में प्रयुक्त होने वाले पाइप भी मिले हैं, जिससे यहाँ से पाँच सौ ईसा पूर्व लोहा गलाने का कार्य होने का अनुमान लगाया जाता है। यहाँ से लौह प्रौद्योगिकी के उद्भव एवं विकास के और प्रमाण मिलने की संभावना है।

सुनारी सभ्यता

सुनारी सभ्यता झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील में कांटली नदी तट पर अस्तित्व में आई। सुनारी व जोधपुर उत्खनन से इस स्तर में जो महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए हैं वह अयस्क से लौह धातु बनाने वाली भट्टियों के अवशेष है। इस प्राप्त लौह धातु से लौह उपकरण भी इन्हीं भट्टियों के पास दूसरी भट्टियों द्वारा बनाए जाते थे। सुनारी की पहली भट्टी खुली प्रकार की धमन भट्टी है, जिसमें उपलों के माध्यम से अयस्क द्वारा लौह धातु प्राप्त की जाती थी। दूसरे प्रकार की भट्टी जिसके माध्यम से लौह उपकरणों का निर्माण किया जाता था इनमें धौंकनी लगाने का प्रावधान भी है। धौंकनी के माध्यम से भट्टी के तापक्रम पर पर्याप्त नियंत्रण रखा जा सकता था जो की लौह सामग्री बनाने की अवस्था हेतु आवश्यक कारक थी। सुनारी उत्खनन से उपलब्ध इस प्रकार की भट्टियां देश की प्राचीनतम लौह भट्टियाँ मानी जाती हैं।

सभ्यता स्थल खेतड़ी
सभ्यतालौहयुगीन सभ्यता
नदी कांतली नदी
जिलाझुंझुनूं

सुनारी उत्खनन से प्राप्त अवशेष :

  • यहाँ से लोहे के तीर, कृष्ण परिमार्जित मृद्मात्र, मिट्टी तथा पत्थर के मनके, शंख की चूड़ियाँ तथा मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं।
  • यहाँ से मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ तथा चाक से बने काले रंग के मृपात्र मिले हैं, जिन्हें कुषाणकालीन माना जाता है।
  • इन लोगों का आहार चावल, गोमांस व घोड़े का मांस होता था।
  • इन लोगों ने घोड़े का उपयोग रथ खींचने के निमित भी किया था। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ की बस्ती वैदिक आर्यों ने बसाई थी।
  • सुनारी से लोहे का एक प्याला (कटोरा) उपलब्ध हुआ है। इन स्तरों से सम्पूर्ण भारतवर्ष में यही प्याला प्राप्त हुआ है।
  • एक वृहत भंडारण पात्र(मूण) जो लगभग 4.9 फीट ऊंचा है सुनारी के उत्खनन से प्राप्त हुआ है।इस से ज्ञात होता है की शेखावाटी क्षेत्र धन-धान्य से संपन्न था।

जोधपुरा की सभ्यता

जयपुर जिले में साबी नदी तट पर जोधपुरा गाँव में 1972-75 ई. में उत्खनन में जोधपुर सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए। यह सभ्यता 2500 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के मध्य फली फूली। उत्खनन में स्लेटी रंग के चित्रित मृद्पात्र पानी पीने के पात्र, कटोरे तथा तश्तरियों के अवशेष मिले हैं। यहाँ से लोहे के शस्त्र, लोहे के बने तीरों के अग्रभाग, लोहे की कीलें, शंख निर्मित चूड़ियों के टुकड़े, कुबड़बैल की आकृतियाँ तथा मिट्टी एवं पत्थर के मनके मिले हैं। जोधपुरा से लोहा गलाने की भट्टियाँ भी मिली हैं। इन भट्टियों में अयस से लोहा प्राप्त करने हेतु उपलों का उपयोग नहीं किया जाता था। इस प्राप्त लोह धातु से लौह उपकरण भी इन्ही भट्टियों के पास दूसरी भट्टी द्वारा बनाये जाते थे।

सभ्यता स्थल जोधपुरा गाँव
सभ्यता 2500 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के मध्य लौहयुगीन सभ्यता
नदी साबी नदी
जिलाजयपुर
उत्खनन वर्ष 1972-75 ई.
उत्खनन कर्तारत्नचन्द्र अग्रवाल व विजयकुमार

उत्खनन से प्राप्त अवशेष :

  • उत्खनन में गैरिक रंग के पानी पीने के पात्र, कटोरे तथा तश्तरियों के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ से लोहे के शस्त्र, लोहे के बने तीरों के अग्रभाग, लोहे की कीलें, शंख निर्मित चूड़ियों के टुकड़े, कुबड़बैल की आकृतियाँ तथा मिट्टी एवं पत्थर के मनके मिले हैं।
  • जोधपुरा से लोहा गलाने की भट्टियाँ भी मिली हैं।
  • ताम्रयुगीन सभ्यता के प्रतीक कपीषवर्णी मृद्पात्रों का यहाँ डेढ़ मीटर का जमाव है। इन मृद्पात्रों पर सैन्धव प्रभाव विशेष रूप से उल्लेख योग्य है। मृद्पात्रों के अलावा यहाँ डिश ऑन स्टैंड भी मिला है।
  • यहाँ मानव आवास के चिन्ह फर्श व ईंटों की दिवार के रूप में मिलते है। मकान की छतों पर टाइलों का प्रयोग मिलता है व साथ ही छप्पर छाने के भी चिन्ह मिलते है।

नगर की सभ्यता

  • सभ्यता जिला – टोंक
  • प्राचीन नाम – मालव नगर

यह स्थल टोंक के उणियारा कस्बे के पास स्थित हैं। यहां से गुप्तकालीन अवशेष, सिक्के व आहत मुद्राए प्राप्त हुई है।नगर के उत्खनन से 6000 मालव सिक्के मिले हैं। महाभारत में उल्लिखित मालवों की राजधानी कार्कोट नगर का समीकरण इससे किया जाता है। नगर नैनवा में श्री कृष्णदेव ने खुदाई करवाई जिसमे लगभग 2000 वर्ष प्राचीन महिषासुरमर्दिनी की मृण्मूर्ति प्राप्त हुई। जो इस देवी का प्राचीनतम अंकन है।

उत्खनन से प्राप्त अवशेष :

  • नगर के उत्खनन से 6000 मालव सिक्के मिले हैं।
  • यहाँ उत्खनन से लाल रंग के मृद्भाण्ड एवं अनाज भरने के कलात्मक मटकों के अवशेष तथा विभिन्न कलात्मक वस्तुएँ, आभूषण, लौह उपकरण, मिट्टी के बर्तन, मुद्राएँ एवं प्रतिमाएँ मिली हैं। इन्हें पहली शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसा तक का माना जाता है।
  • उत्खनन से गुप्तोत्तरकालीन स्लेटी पत्थर से बनी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा, एकमुखी शिवलिंग, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी आदि की प्रतिमाएँ मिली हैं।

नगरी की सभ्यता

चित्तौड़गढ़ के पास स्थित नगरी को पाणिनी की अष्टाध्यायी में उल्लिखित ‘माध्यमिका’ माना जाता है। जो बेड़च नदी के तट पर स्थित था। नगरी शिवि जनपद की राजधानी रही है। 1872 ई. में कार्लाइल द्वारा इसकी खोज की गई। 1919-20 ई. में डी.आर. भंडारकर एवं 1961-62 ई. में के.बी. सौन्दर राजन द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया। यहाँ के उत्खनन से प्रचूर संख्या में शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए है साथ ही कुषाणकालीन स्तरों में नगर की सुरक्षा के निमित्त एक मजबूत दिवार भी बनाई गई थी। यहां से लेखयुक्त शिलाएँ, मृण्मूर्तियाँ, प्रतिमाएँ, अंलकरण युक्त ईंटें, गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष, जिसमें शिव मूर्ति प्रतिष्ठापित थी, मिले हैं। ग्रीक-रोमन प्रभाव से युक्त पुरुष शीर्ष, आहत एवं शिवि जनपद के सिक्के भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं। यहाँ से चार चक्राकार कुएँ एवं गुप्तयुगीन अवशेष भी मिले हैं।

प्राचीन नाम माध्यमिका
नदी बेड़च नदी
जिलाचित्तौड़गढ़
उत्खनन कर्ताकार्लाइल(1872 ई.)
डी.आर. भंडारकर(1919-20 ई.)
के.बी. सौन्दर राजन(1961-62 ई.)

नगरी के उत्खनन से प्राप्त अवशेष :

  • यहाँ के उत्खनन से प्रचूर संख्या में शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए है साथ ही कुषाणकालीन स्तरों में नगर की सुरक्षा के निमित्त एक मजबूत दिवार भी बनाई गई थी।
  • यहां से लेखयुक्त शिलाएँ, मृण्मूर्तियाँ, प्रतिमाएँ, अंलकरण युक्त ईंटें, गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष, जिसमें शिव मूर्ति प्रतिष्ठापित थी, मिले हैं।
  • ग्रीक-रोमन प्रभाव से युक्त पुरुष शीर्ष, आहत एवं शिवि जनपद के सिक्के भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ से चार चक्राकार कुएँ एवं गुप्तयुगीन अवशेष भी मिले हैं।

रैढ़ की सभ्यता

टोंक जिले की निवाई तहसील में स्थित रैढ़ में के.एन. पुरी द्वारा 1938 ई. में उत्खनन करवाया गया। यहाँ से प्राप्त अवशेष तीसरी सदी ईसा पूर्व से दूसरी सदी ई. तक के हैं, जिन्हें मौर्य व शुंगकालीन माना जाता है। उत्खनन में लोहे के औजार अत्यधिक मिलने के कारण रैढ़ को प्राचीन राजस्थान का ‘टाटानगर’ भी कहा जाता है ।

उत्खनन स्थल निवाई तहसील में स्थित रैढ़
नदी ढील नदी
जिलाटोंक
उत्खनन कर्ताके.एन. पुरी(1938 ई.)

उत्खनन में प्राप्त अवशेष :

  • उत्खनन में लौह उपकरण, मिट्टी के मकान, पत्थर के मनके, मृण्मूर्तियाँ तथा अनाज के दाने प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ से 115 घेरेदार कूप तथा तीन हजार आहत मुद्राएँ मिली हैं, जिनमें मालव तथा मिस्र शासकों एवं अपोलोडोट्स का सिक्का तथा इण्डोससेनियन सिक्के प्रमुख हैं।
  • यहाँ से प्राप्त सीसे की एक मुहर पर मालव ‘जनपद स’ ब्राह्मी लिपि में अंकित है, जो यहाँ मालव आधिपत्य को सूचित करता है।
  • यहाँ से सेलखड़ी की एक डिबिया मिली है, जो उन डिबियों के समान है, जिनमें बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष रखे जाते थे ।

राजस्थान की अन्य लौहयुगीन सभ्यताएं :

1. नलियासर – सांभर, जयपुर

जयपुर जिले में सांभर के निकट नलियासर गाँव में उत्खनन के फलस्वरूप आहत मुद्राएँ, उत्तर इण्डोससेनियन सिक्के, कुषाण शासक हुविस्क, इण्डोग्रीक, यौधेय गण एवं गुप्तयुगीन चाँदी के सिक्के मिले हैं। यहाँ से स्वर्ण निर्मित सिंह सिर, ताँबे के पात्र, मिट्टी के बाट, झुनझुने, तलवार, अलंकरण युक्त ईंटें, नालियों के गोल पाइप, पूजा पात्र, मिट्टी के आभूषण, मनके, शीशे की चूड़ियाँ, सिलबट्टे, हड्डी के पासे, काँसे के कड़े तथा 105 कुषाणकालीन मुद्राएँ मिली हैं। सांभर के उत्खनन से प्राप्त सामग्री इस संस्कृति को तीसरी सदी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी तक का सिद्ध करती है।

2. चक84 – गंगानगर

3. तरखानवालों का डेरा – गंगानगर

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